क्या है हमारे ईमाम ओर हमारी ज़िंदगी?




दारुल उलूम से फ़ारिग होने के बाद कही मस्जिद या मदरसे में पढ़ाने की जगह मिलती है 10 -12 साल तक पढ़ने के बाद दीनी तालीम हासिल करके सनद हासिल करने वाले आलिम ,फाजिल और कारियों को मस्जिद मदरसे की ही नोकरी मिलेगी किसी सरकारी दफ्तर में तो मिलने से रही कितने बड़े अफ़सोस की बात है की हमारे यह दीनी रहनुमा
जिन्हें हम अपना इमाम समझते है, उनकी हालत व् पोजीशन कितनी काबिले रहम है .

 बरसो तक तालीम हासिल करने के बाद हमने उन्हें 5000-6000रूपये के काबिल समझा, जिंदगी कितनी महगी हो गई है सभी जानते है की हमारे देश की आया प्रति आदमी 50000-60000है लेकिन हमारे इमाम साहब की केवल 5000 हजार भी मुश्किल है एक ठेला चलाने वाला 1000-1500रुपए रोजाना कमा लेता है लेकिन कौम के ये रहनुमा अवाम की छोटी नजर का शिकार होकर 5000रुपए माहाना में खिदमत करने पर मजबूर है.

ऐसी खिदमत जिसे आज गुलामी कहा जाए तो गलत न होगा कयोकि आज हमारा देश आजाद है लेकिन हमारा इमाम आज भी गुलाम है, मस्जिद सदर,सेकेट्री नमाजी सभी उन पर कड़ी नजर रखते है ,इतनी मामूली रकम पाने वाला अपना अकेले का भी गुजारा मुश्किल से कर पाता है ,घर,घर की रोटिया खाने पर मजबूर है, क़ौम की बेहिसी उन्हें न जाने कितनी चोखटो पर हाजिरी देने के लिए मजबूर कर रही है,ये सब इल्म की कमी की वजह से.

हमारे आका ने फ़रमाया की ये ऊलेमा व् इमाम मजहबे इस्लाम के फैजान वाले है और नायबे रसूल है अरे इमामत की जिम्मेदारी कितनी अहम है? इसका अंदाजा उन्ही को है जो यह खिदमत अंजाम दे रहे है कयोकि हर नोकरी के लिए कुछ वक़्त मुकर्रर है लेकिन इमाम की नोकरी 24 घटे की होती है। कौम के किसी भी आदमी को जब भी रात हो या दिन सर्दी हो या गर्मी बरसात हो या धुप ,जरूरत पड़ने पर इमाम को हाजिर होना ही पड़ता है .

निकाह चाहे रात के 3 बजे हो इमाम  साहब को हाजिर रहना जरूरी है ।मोत हो जाए इमाम साहब को रहना जरुरी, इतनी पक्की डुयूटी होने के बावजूद किसी इन्सानी जरूरत की वजह से कभी किसी वक़्त की नमाज में देर हो जाए या कभी मदरसे मे लेट हो गए तो फिर खेर नही ,नमाज न पड़ने वाले भी इमाम साहब की हाजरी लेने के लिए तैयार ,शोर होने लगता है की इमाम अच्छा नही, जल्दी हटाओ ,दूसरा लाओ ।ये भूल जाते हैं की वह  हमारे काबिले ऐहतराम इमाम हैं, हमने उनके पीछे नमाजे पड़ी है 

क़ौम अपने इमामो को नपी तुली तनख्वाह देती है जिसमे उनका अकेले का भी गुजारा नही हो पाता है ,अगर दूसरी जरुरतो को भूलकर उसी पर सब्र कर जिंदगी गुजारे तो उनके पास इतनी रकम नही बचती जो मुसीबत के वक़्त काम आ सके ,ऐसे लोगो का कफ़न दफन भी चंदे से करना पड़ता है. 24 घटे की खिदमत करने वाले दीन के खिदमत गुजारो का यह दर्दनाक अंजाम होगा तो भला कौन अपने बच्चों को दीनी तालीम दिलाना चाहेगा यही वजह हैं की आने वाली नस्ले दीनी तालीम से महरूम होती जा रही है, आलिम अपनी हालत देखते हुए अपनी औलाद को आलिम, हाफिज बनाना पसन्द नही करते।

 काबिल इमामो की कमी होती जा रही है और फोटो कॉपी नकलती जा रही हैं। ऐसे संगीन वक़्त में दीनी इदारो में दीनी तालीम के साथ कुछ ऐसी तालीम व् टेर्निग भी दी जाए जिस से वहा से फ़ारिग होने वाला इमामत करने पर मजबूर न हो बल्कि अपने हुनर से अपनी जिंदगी आराम से गुजरने सामान पैदा करे और दीन की खिदमत भी जिस तरह प्राइवेंट स्कुलो और कॉलेजों मे कम्प्यूटर सिखाया जाता है और उसमे अकाउंट का काम ऑटोकेड और दूसरे काम जो दो तीन महीने में बच्चा आसानी से सीख सकता हो और हुनर के साथ  साथ कम से कम दसवी क्लास पास करवाए ताकी कोई सरकारी दफ्तर में भी काम कर सके और सरकारी कर्मचारियों को दीन की तालीम भी दे सके ।

अगर दीनी इदारों में तालिमो तरबियत का ऐसा निजाम हो जाए तो आने वाली नस्ले कौम के रहमो करम पर रहने के बजाय अपनी मेहनत और मजदूरी से अच्छी तरह गुजरा बसर करने के काबिल हो जाए और मस्जिद के सदर व् सेकेट्री  उन्हें दर दर का खाना खाने पर मजबूर न कर सके ,नौकर न समझे बल्कि ऐहतराम के लायक अपना इमाम समझे. यह भी जुल्म है की जो इमाम हजरत इमामत के अलावा किसी और जायज़ तरीके से मेहनत करके दो पैसे कमाने लगते है कौम उन्हें माफ़ नही करती बल्कि तरह तरह की बाते बनाकर जलील करने की कोशिश करती रहती है ।

क़ौम को चाहिए की वह इमाम हजरात को भी अपने जैसा ऐक आदमी समझे जिसे रहने के लिए मकान सुख दुःख के लिए पैसे की जरूरत होती है. उनकी खिदमत करे ताकि दीनी तालीम की कदर हो सके .

या फिर हमको चाहिये कि हम एक कमेटी बनाकर मस्जिद ओर ईमाम दोनों की ज़िम्मेदारी लें इससे हमको भी फ़ायदा होगा ओर ईमामों को भी उनका दर्जा जो हक़ है मिल सकेगा ?
ये मेरी रॉय है 
एस एम फ़रीद भारतीय 
+919808123436
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