सच मैं "मन की बात" दिमाग की सारी बत्तियां जल गई, अब बत्तियां लुप लुप कर रही हैं, नहीं समझ मैं आ रहा है कि ये मन की बात थी या देश से मज़ाक?
क्या किया ओर क्या कहा मन की बात मैं शायद खुद बोलने वाले की भी समझ से बाहर की बात है, क्यूंकि बिन सोचे समझे बोलने वाले के साथ ऐसा ही होता है.
मुझको लगता है जनाब अब तक ख़ुद यक़ीन नहीं कर पा रहे हैं कि देश की जनता को हम बेवकूफ़ बना चुके हैं ओर वो बन चुकी है.
अब हमारी कहने की नहीं कुछ करने की बारी है, लेकिन जनाब हैं कि आज भी बस बोल ही रहे हैं करना किसको कब ओर क्या है नहीं मालूम.
उधर अंधभक्त ख़ुद अपनी ढफ़ली ये कहकर पीटने मैं लगे हैं कि मेरा साजन घर आयो, साजन है कि अब भी यक़ीन नहीं कर पा रहा क्यूंकि जागते का सपना लग रहा है.
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