सरकारी सम्पत्ति पर प्राइवेट कम्पनी का कब्ज़ा, बन रहा है सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को अनदेखा कर एयरटेल का टावर...?
"ख़बर एनबीटीवी इंडिया"
हम आपको बता दें कि भारत में ऐसा पहली बार हुआ जब एक व्यक्ति की शिकायत पर हानिकारक रेडिएशन को आधार बना कोई मोबाइल टावर बंद किया गया था, कैंसर पीड़ित की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 7 दिनों के भीतर एक मोबाइल टावर को बंद करने का आदेश दिया है। ग्वालियर के रहनेवाले 42 साल के हरीश चंद तिवारी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में ये ऐतिहासिक फैसला सुनाया था.
दरअसल हुआ यूं कि हरीश चंद तिवारी 'हॉजकिन्स लिम्फोमा' (एक तरह का कैंसर) बीमारी से ग्रसित थे, उन्होंने साल 2017 मैं सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई और बताया कि बीएसएनएल के मोबाइट टावर के कारण उन्हें हानिकारक रेडिएशन का शिकार होना पड़ रहा है.
अपनी शिकायत में हरीश ने कहा था कि पड़ोसी के घर की छत पर 2002 में अवैध रूप से बीएसएनएल का मोबाइल टावर लगाया गया और वो जहां काम करते हैं वहां से टावर की दूरी 50 मीटर से भी कम है, जस्टिस रंजन गोगोई और नवीन सिन्हा की बेंच ने बीएसएनएल को 7 दिनों के भीतर उक्त टावर को बंद करने का आदेश दिया था, सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई साल 2017 मार्च 18 से शुरू हुई थी, और फ़ैसला 11 अप्रेल 2017 मैं आया.
आरडब्ल्यूए के प्रेसिडेंट संजीव सेठ ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि रिहायशी इलाकों से 500 मीटर की दूरी पर टावर लगाया जा सकता है, लेकिन इन सब नियमों को ताक पर रखकर यहां टावर लगाया जा रहा था. यहां करीब 1000 से अधिक लोग रहते है, मीडिया मैं खबर चलने के बाद टावर को हटाने का काम शुरू किया गया था.
बहुत से स्थानीय निवासियों का कहना था, कि उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि टावर अब हटेगा, लेकिन मीडिया ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया, तब जाकर के अधिकारियों-कर्मचारियों की नींद खुली और तब टावर को हटाने का काम शुरू कर दिया गया, बुलंदशहर टावर के मामले मैं स्थानीय निवासियों के साथपूर्व नगर परिषद पार्षद नूर कुरैशी का कहना है कि वो हर वक्त इलाके के निवासियों के साथ खड़े हैं और उन्होंने पूरा मन लिया है कि किसी भी सूरत में यहां पर टावर नहीं लगने देना है.
टावर से रेडियेशन का ख़तरा तो है ही साथ ही सुप्रीम कोर्ट जब कोई फ़ैसला देता है तब वो पूरे मुल्क के लिए एक नज़ीर बन जाता है, कहीं भी फ़ैसले की ख़िलाफ़वर्ज़ी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की ख़िलाफ़वर्ज़ी होती है, ऊपर कोट मैं तो बीस हज़ार से ज्यादा लोग रहते हैं और वहां मौजूदा तीन स्कूलों मैं दूसरे इलाके से भी बच्चे पढ़ने आते हैं लिहाज़ा यहां सरकारी ज़मीन पर प्राईवेट टावर लगाने की अनुमति किसने और क्यूं दी ये सबसे अहम मसअला है, क्या इजाज़त देने वाले अधिकारी नहीं जानते कि सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया है वो भी पुलिस थाने की नाक के नीचे...?
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